अब तक सुमनों पर चलते थे…

राष्ट्रसेवा के व्रती लोगों को राष्ट्र के लिए तिल तिल कर अपने आप को मिटा देने की प्रेरणा देने वाला एक संग्रहणीय गीत….

अब तक सुमनों पर चलते थे, अब कांटों पर चलना सीखें .
खङा हुआ है अटल हिमालय, दृढता का नित पाठ पढाता..

बहो निरंतर ध्येय सिंधु तक,सरिता का जल कण बतलाता.
अपने दृढ निश्चय से ,सबकी बाधांओं को ढहना सीखें…1

अपनी रक्षा आप करें जो ,देता उसका साथ विधाता .
अन्यों पर अवलंबित है जो, पग पग पर है ठोकर खाता..

जीवन का सिध्दांत अमर है, उस पर है हम चलना सीखें …2

हममें चपला सी चंचलता,हममें मेघों का गर्जन है.
हममें पूर्ण चंद्रमा –चुंबी,सिंधु तरंगों का नर्तन है..

सागर से गंभीर बने हम,पवन समान मचलना सीखें…3

उठें उठें अब अंधकार मय,जीवन पथ आलोकित कर दें..
निबिङ निशा के गहन तिमिर को ,मिटा आज जग ज्योतित कर दे..

तिल –तिल कर अस्तित्व मिटा दें दीप शिखा सम जलना सीखें…4

(यह गीत तत्वचर्चा के सौजन्य से प्राप्त हुआ)

3 comments so far

  1. pooja sarkar on

    this poem is nice as well as giving a sense i somehow like this poem.
    rate out of 100 would be 70

  2. Sushant Singhal on

    भावी युग के निर्माता, मानवता के हम त्राता,
    जिसके हैं हम सुत प्यारे, जय भारत जननी !

    भूखे नंगे, रोग भरे, दलित जनों की पीर हरें
    संवेदनक्षम हृदय लिये हम, मुक्तिसाध के विज्ञाता ॥ मुक्ति साध के विज्ञाता ॥

    आओ मिल जुल यज्ञ करें, हिन्दूराष्ट्र में शक्ति भरें।
    इन नयनों से ही देखें हम, भगवा जग में लहराता ॥ भगवा जग में लहराता॥

  3. Sushant Singhal on

    मन समर्पित, तन समर्पित, और यह जीवन समर्पित ।
    चाहता हूं देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूं ! मन समर्पित….

    मां तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन !
    किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
    थाल में लाकर सजाऊं भाल जब
    स्वीकार कर लेना दया कर वह समर्पण ।
    दान अर्पित, मान अर्पित, आयु का कण – कण समर्पित ! चाहता हूं देश …


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