मातृ भू पुकारती

तरुण वीर देश के मूर्त वीर देश के
जाग जाग जाग रे मातृ भू पुकारती
शत्रु अपने शीष पर आज चढ़के बोलता

शक्ति के घमंड में देश मान तोलता

प्रात की समाधि को शम्भु के निवास को
देख आँख खोल तू  हर गला तिटोलाता
अस्थि दे की रक्त तू भक्ति दे की शक्ति तू
कीर्ति है कड़ी हुई आरती उतारती    ……   मातृ भू पुकारती
तरुण वीर देश के मूर्त वीर देश के

आज नेत्र तीसरा रूद्र देव का खुले
तांडव के तान पर कांप व्योम भू डुले
तन सर पे जो उठी बाहु शीघ्र ध्वस्त हो
बाहु बाहु वीर की स्वाभिमान से खिले
आज शंख फूंक रे शूर यों न चुक रे
मातृ भूमि आज फिर है तुझे निहारती    …… मातृ भू पुकारती
तरुण वीर देश के मूर्त वीर देश के

आज हाथ रिक्त क्यूँ  जन जन विक्षिप्त क्यूँ
शस्त्र हाथ में लिए करके तिरछी आजको
देश लाज के लिए गण के साज के लिए
समय आज आ गया तु खड़ा है मौन क्यूँ
करो सिंह गर्जना शत्रु से है निपटना
जय निनाद बोल रे है अजेय भारती    …… मातृ भू पुकारती
तरुण वीर देश के मूर्त वीर देश के

तरुण वीर देश के मूर्त वीर देश के
जाग जाग जाग रे मातृ भू पुकारती

जाग जाग जाग रे मातृ भू पुकारती

प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढे चलो-बढे चलो

हिमाद्री तुंग श्रुंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती

स्वयंप्रभा समुज्वला स्वतंत्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ प्रतिज्ञा सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढे चलो-बढे चलो

असंख्य कीर्ति रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह सी
सपूत मातृभूमि के, रुको न शूर साहसी,

अराती सैन्य सिन्धु में सुबाड़वाग्नी से जलो,
प्रवीर हो, जयी बनो, बढे चलो, बढे चलो.
  • स्व. जयशंकर प्रसाद

हम करें राष्ट्र आराधन

हम करें राष्ट्र आराधन
तन से मन से धन से
तन मन धन जीवनसे
हम करें राष्ट्र आराधन………………।।

अन्तर से मुख से कृती से
निश्र्चल हो निर्मल मति से
श्रध्धा से मस्तक नत से
हम करें राष्ट्र अभिवादन…………………। १

अपने हंसते शैशव से
अपने खिलते यौवन से
प्रौढता पूर्ण जीवन से
हम करें राष्ट्र का अर्चन……………………।२

अपने अतीत को पढकर
अपना इतिहास उलटकर
अपना भवितव्य समझकर
हम करें राष्ट्र का चिंतन…।………………।३

है याद हमें युग युग की जलती अनेक घटनायें
जो मां के सेवा पथ पर आई बनकर विपदायें
हमने अभिषेक किया था जननी का अरिशोणित से
हमने श्रृंगार किया था माता का अरिमुंडो से

हमने ही उसे दिया था सांस्कृतिक उच्च सिंहासन
मां जिस पर बैठी सुख से करती थी जग का शासन
अब काल चक्र की गति से वह टूट गया सिंहासन
अपना तन मन धन देकर हम करें पुन: संस्थापन………………।४

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।

समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।

।। भारत माता की जय ।।

अब तक सुमनों पर चलते थे…

राष्ट्रसेवा के व्रती लोगों को राष्ट्र के लिए तिल तिल कर अपने आप को मिटा देने की प्रेरणा देने वाला एक संग्रहणीय गीत….

अब तक सुमनों पर चलते थे, अब कांटों पर चलना सीखें .
खङा हुआ है अटल हिमालय, दृढता का नित पाठ पढाता..

बहो निरंतर ध्येय सिंधु तक,सरिता का जल कण बतलाता.
अपने दृढ निश्चय से ,सबकी बाधांओं को ढहना सीखें…1

अपनी रक्षा आप करें जो ,देता उसका साथ विधाता .
अन्यों पर अवलंबित है जो, पग पग पर है ठोकर खाता..

जीवन का सिध्दांत अमर है, उस पर है हम चलना सीखें …2

हममें चपला सी चंचलता,हममें मेघों का गर्जन है.
हममें पूर्ण चंद्रमा –चुंबी,सिंधु तरंगों का नर्तन है..

सागर से गंभीर बने हम,पवन समान मचलना सीखें…3

उठें उठें अब अंधकार मय,जीवन पथ आलोकित कर दें..
निबिङ निशा के गहन तिमिर को ,मिटा आज जग ज्योतित कर दे..

तिल –तिल कर अस्तित्व मिटा दें दीप शिखा सम जलना सीखें…4

(यह गीत तत्वचर्चा के सौजन्य से प्राप्त हुआ)

हिन्दी कौमी तराना

आजाद हिन्द फोज में कर्नल हबीबुर रहमान सहीत कई मुस्लीम सैनिक थे, इस लिए नेताजी सुभाषचन्द्र ने सम्भावित टक्कराव को टालने के लिए वन्देमातरम के स्थान पर जन-गण-मन को अपनाया तथा कुछ समय बाद इस का हिन्दी अनुवाद सम सुख चैन तैयार करवाया जीसे हिन्दी कौमी तराना नाम दिया गया. इस की संगीतमय धून केप्टन रामसिंह ने तैयार की थी.

सम सुख चैन की बरखा बरसे
भारत भाग है जागा
पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा उत्कल बंग
चंचल सागर विंध्य हिमालय नीला जमुना गंगा
तेरा मिल गुण गाएं
तुझसे जीवन पाएं
सब तन पाएं आशा
सूरज बन कर जग पर चमका भारत नाम सुभागा
जय हो जय हो
जय जय जय जय हो
सब के दिल में प्रीत बरसे तेरी मीठी वाणी
हर सूबे के रहने वाले हर मजहब के प्राणी
सब भैद-ओ-फर्क मिटा कर
सब गोद मे तेरी आके
गूंथे प्रेम की माला
सूरज बन कर जग पर चमका भारत नाम सुभागा
जय हो जय हो
जय जय जय जय हो
सुबह सवेरे पन्ख पखेरू तेरे ही गुण गाएं
बर भारी भरपूर हवाएं जीवन में ऋतु लाएं
सब मिल का हिन्दी पुकारें
जय आजाद हिन्द के नारे
प्यारा देश हमारा
सूरज बन कर जग पर चमका भारत नाम सुभागा
जय हो जय हो
जय जय जय जय हो
भारत नाम सुभागा

सम्पूर्ण ‘जन-गण-मन’

-१-
जन-गण-मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्य-विधाता,
पंजाब-सिन्धु-गुजरात-मरठा-
द्राविधू-उत्कल-बन्ग
विन्ध्य-हिमाचल-यमुना-गन्गा
उच्छल-जलधि-तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशीष मांगे,
गाहे तव जय-गाथा
जन-गण-मन-मंगलदायक जय हे
भारत-भाग्य-विधता
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
-२-
अहरह तव आह्नान प्रचारित,
शुनि तव उदार वाणी-
हिन्दु-बौद्ध-शिख-जैन-पारसिक-
मुसलमान-खृष्टानि
पूरब-पश्चिम आसे
तव सिहांसनपाशे
प्रेमहार, हय गाथा,
जन-गण-ऐक्य-विधायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
-३-
पतन-अभ्युदय-वन्धुर-पंथा,
युगयुग धावित यात्री,
हे चिर-सारथी,
तव रथ चक्रेमुखरित पथ दिन-रात्रि
दारुण विप्लव-माझे
तव शंखध्वनि बाजे,
सन्कट-दुख-श्राता,
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
-४-
घोर-तिमिर-घन-निविङ-निशीथ
पीङित मुर्च्छित-देशे
जाग्रत दिल तव अविचल मंगल
नत नत-नयने अनिमेष
दुस्वप्ने आतंके
रक्षा करिजे अंके
स्नेहमयी तुमि माता,
जन-गण-दुखत्रायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
-५-
रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि
पूरब-उदय-गिरि-भाले,
साहे विहन्गम, पूएय समीरण
नव-जीवन-रस ढाले,
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा,
जय जय जय हे, जय राजेश्वर,
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे

समपूर्ण वन्दे मातरम् गीत

वन्दे मातरम्
सुजलाम् सुफलम् मलयजशीतलाम्
सस्यश्यामलाम् मातरम्
शुभ्रज्योत्स्नपुलकितयामिनिम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनिम्
सुहासिनीम् सुमधुरभाषिणीम्
सुखदाम् वरदाम् मातरम्
कोटिकोटिकण्ठकलकलनिनादकराले
कोटीकोटीभुजैधृतैखरकरवाले
के बले मा तुमि अबले
बहूबलधारिणीम् मतरम्
तुमि विद्या तुमि धर्म तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहु ते तुमि मा शक्ति,हृदये तुमि मा भक्ति
तोमाराइ प्रतिमा कडि मंदिरे मंदिरे,मातरम्
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादयिनी
नमामि त्वां नमामि कमलाम् अमलाम्
अतुलाम् सुलजाम्
सुफलाम् मातरम्
श्यामलाम् सरलाम् सुस्मिताम् भुषिताम्
धरणीम् भरणीम् मातरम्

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